भारतीय राज्य विधानसभा चुनाव 2022 : पत्रकार सुरक्षा गाईड

5 जनवरी, 2022 को मुंबई के एक रेलवे स्टेशन पर फेस मास्क पहने हुए रेल यात्री कोविड-19 के परीक्षण के लिए इंतजार कर रहे हैं। भारत में काम कर रहे पत्रकारों के समक्ष यह वायरस कई बाधाओं में से एक है क्योंकि वे फरवरी और मार्च में हो रहे देश के पांच राज्यों में विधान सभा चुनावों को कवर करने की तैयारी कर रहे हैं। (एपी / रफ़ीक़ मक़बूल)

भारत के पांच राज्यों क्रमशः  गोवा, मणिपुर, पंजाब, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश में फरवरी एवं मार्च 2022 में विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। 

वह पत्रकार एवं मीडिया कर्मी जो इनमें से किसी भी राज्य के चुनावों में पत्रकारिता  करने जा रहे हैं उन्हें शारीरिक हमलों, डराने की कोशिश, उत्पीड़न; इंटरनेट पर डराना, कोविड-19 संक्रमण, गिरफ़्तारी, नज़रबंदी, रिपोर्टिंग पर सरकारी प्रतिबंध, इंटरनेट पर रोक, इत्यादि रुकावटों और ख़तरों के सन्दर्भ में  जानकारी होनी चाहिए. वर्ष 2021 में भारत में पांच पत्रकारों की पत्रकारिता के कारण मृत्यु हो गई, संख्या के आधार पर इस वर्ष के लिए सीपीजे के वैश्विक रिकॉर्ड में पत्रकारों की मृत्यु के मामले में भारत शीर्ष पर है; 1 दिसंबर, 2021 तक सात पत्रकारों को उनके काम के कारण  जेल में डाल दिया गया था। नेटवर्क ऑफ वीमेन इन मीडिया इंडिया संस्था द्वारा संकलित एक डेटाबेस के अनुसार, भारत में मीडिया के क्षेत्र में काम कर रहे सैकड़ों लोग कोविड-19 से संक्रमित होने के बाद मारे गए हैं। सांप्रदायिक तनाव के बीच पत्रकारों को अपने धर्म, लिंग और पहचान की वजह से प्रतिशोध का सामना करना पड़ा है और उन पर धार्मिक हिंसा पर पत्रकारिता करने के लिए सांप्रदायिक वैमनस्य फैलाने का आरोप लगाया गया है।

अंतर्वस्तु

• संपादक की सुरक्षा जाँच सूची

• डिजिटल सुरक्षा: ऑनलाइन उत्पीड़न और गलत सूचना अभियान

• डिजिटल सुरक्षा: बुनियादी उपकरण तैयारी

• डिजिटल सुरक्षा: सामग्री की सुरक्षा और भंडारण

• डिजिटल सुरक्षा: सुरक्षित संचार

• शारीरिक सुरक्षा: कोविड-19 के सन्दर्भ में विचार

• शारीरिक सुरक्षा: चुनावी रैलियों और विरोध प्रदर्शनों के दौरान पत्रकारिता करने के सन्दर्भ में 

• शारीरिक सुरक्षा: शत्रुतापूर्ण समुदाय  के बीच जा कर पत्रकारिता करने के सन्दर्भ में

जैसा कि जनसंदेश समाचार पत्र के पूर्व संपादक विजय विनीत, जो अब उत्तर प्रदेश में न्यूज़क्लिक वेबसाइट के लिए स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम कर रहे हैं, ने सीपीजे को फोन के माध्यम से बताया, “उत्तर प्रदेश में कोई भी मीडिया संस्थान पत्रकारों को किसी भी प्रकार का सुरक्षा प्रशिक्षण प्रदान नहीं करता है और  अपने पत्रकारों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतज़ाम भी नहीं करता है।”

उन्होंने कहा कि ” जैसा कि हम महसूस हैं कि यह एक बराबर की लड़ाई वाला चुनाव बन गया है,  ऐसे में इन चुनावों में हिंसा होने की प्रबल संभावना है।”

सीपीजे एमर्जेन्सीज़ ने चुनाव के दौरान काम करने वाले पत्रकारों के लिए अपनी सुरक्षा गाइड में बदलाव किए हैं. इस सुरक्षा गाइड में सम्पादकों, पत्रकारों और फ़ोटो पत्रकारों के लिए आगामी विधानसभा चुनावों से जुड़ी तैयारी व डिजिटल, शारीरिक और मनोवैज्ञानिक चुनौतियों से निपटने के सन्दर्भ में  दिशानिर्देश दिए गए हैं.

चुनाव सुरक्षा गाइड की पीडीएफ अंग्रेज़ी, हिंदी एवं पंजाबी भाषाओं में डाउनलोड करने के लिए उपलब्ध हैं.

संपर्क एवं संसाधन

इस सन्दर्भ  में किसी प्रकार के सहयोग या मदद  के लिए इच्छुक पत्रकार सीपीजे एमर्जेन्सीज़ में emergencies@cpj.org पर संपर्क कर सकते हैं. इसके अलावा सीपीजे के एशिया प्रोग्राम में वरिष्ठ शोधकर्ता  सोनाली धवन से sdhawan @cpj.org अथवा भारत संवाददाता कुणाल मजूमदार से kmajumder@cpj.org पर संपर्क किया जा सकता है.

इसके अलावा,सीपीजे के संसाधन केन्द्र से सौंपे गए काम पर जाने से पहले की तैयारी और किसी घटना के बाद सहायता से जुड़ी और अधिक जानकारी भी प्राप्त की जा सकती है.

सम्पादक सुरक्षा सूची

विधान सभा चुनाव से पहले, चुनाव के दौरान और चुनाव के बाद, सम्पादक एवं सम्पादकीय प्रभाग अपने संस्थान के पत्रकारों को कम समय के नोटिस पर समाचार संकलन करने के लिए भेज सकते हैं. इस सूची में कुछ ऐसे सवाल और कार्य विधि का विवरण है जिनके माध्यम से पत्रकार काम से जुड़े जोखिम को कम कर सकते हैं.

पत्रकार चुनते समय ध्यान में रखने योग्य बिंदु :

उपकरण और यातायात

 ध्यान में रखने योग्य कुछ सामान्य  बिंदु :

जोखिम के आंकलन और उससे जुड़ी तैयारी के सन्दर्भ में अधिक जानकारी प्राप्त करने के लिए सीपीजे के रिसोर्स सेंटर पर जाएं.

चुनाव की अवधि के दौरान लक्षित ऑनलाइन अभियानों सहित ऑनलाइन उत्पीड़न के मामलों के बढ़ने की संभावना है, विशेष रूप से भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में चुनाव के दौरान ऐसे मामले बढ़ सकते हैं। हाल के परिष्कृत उदाहरणों में टेक फॉग नामक ऐप का मामला शामिल है, जिसने विशिष्ट पत्रकारों के बारे में आपत्तिजनक संदेशों के बड़े पैमाने पर वितरण करने को प्रोत्साहित किया है। महामारी के दौरान हिन्दी, अंग्रेजी एवं बांग्ला भाषाओं में  अभद्र भाषा फेसबुक पर फैल गई थी, द वायर ने प्रकाशित किया कि  महिलाओं और अल्पसंख्यकों को लोकप्रिय लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत किया गया एवं कुछ को नकली नीलामियों के माध्यम से बिक्री के लिए पेश किया गया। मीडिया कर्मियों को अक्सर ऐसे ऑनलाइन हमलावरों द्वारा निशाना बनाया जाता है जो पत्रकार और उनके काम को बदनाम करना चाहते हैं। इसमें अक्सर समन्वित उत्पीड़न और गलत सूचना अभियान शामिल हो सकते हैं जो पत्रकार को सोशल मीडिया का उपयोग करने में असमर्थ छोड़ देते हैं, अनिवार्य रूप से उन्हें ऑफ़लाइन करने के लिए मजबूर करते हैं। ऑनलाइन हमलों से बचाव करना आसान नहीं है, हालांकि कुछ ऐसे कदम हैं जो पत्रकार अपनी और अपने सोशल मीडिया के खातों की बेहतर सुरक्षा के लिए उठा सकते हैं।


कोविड -19 कोरोना वायरस के खिलाफ निवारक उपाय के रूप में फेसमास्क पहने हुए एक व्यक्ति 11 जनवरी, 2022 को नई दिल्ली के एक बाजार में अपने मोबाइल फोन पर बात कर रहा है। (एएफपी / सज्जाद हुसैन)

बेहतर सुरक्षा हेतु उपाय: सोशल मीडिया अकाउंट की सुरक्षा

ऑनलाइन उत्पीड़क आपके सोशल मीडिया अकाउंट से व्यक्तिगत जानकारी हासिल कर आपको निशाना बना सकते हैं और आपका  उत्पीड़न कर सकते हैं अतः अपने खाते और उसके डाटा की सुरक्षा हेतु निम्नलिखित  कदम उठाएं:

ऑनलाइन हमला होने की स्थिति में क्या करें:


डिजिटल सुरक्षा:  उपकरणों से सम्बंधित बुनियादी तैयारी :

चुनाव में पत्रकारिता या समाचार संकलन करने के दौरान पत्रकारों को अक्सर अपने मोबाइल फोन के माध्यम से समाचार संकलन एवं समाचारों का आदान प्रदान करने के साथ अपने सहकर्मियों एवं सूत्रों से संपर्क में बने रहना होता है।  चुनाव के दौरान काम से जुड़ी सामग्री की सुरक्षा और संचयन पर संलेख होना महत्वपूर्ण है. यदि कोई पत्रकार गिरफ़्तार कर लिए जाते हैं, और उनके उपकरणों की जाँच होती है, तो ऐसी परिस्थिति में पत्रकार और उनके सूत्रों के लिए गंभीर समस्या पैदा हो सकती है. चुनाव के दौरान रिपोर्टिंग करते समय उपकरण को क्षति पहुँचने या खो जाने का ख़तरा बना रहता है. ऐसे में डाटा बैकअप न होने पर पत्रकार द्वारा इकट्ठा की गई महत्वपूर्ण जानकारी खो सकती है. अतः किसी  भी कार्य पर जाने से पहले इन बिंदुओं का ध्यान रखें :

डिजिटल सुरक्षा पर और अधिक जानकारी के लिए  की सीपीजे डिजिटल सुरक्षा गाइड को पढ़ें.

पेगासस स्पाईवेयर पर और अधिक जानकारी के लिए सीपीजे  की सुरक्षा प्रदर्शिका को पढ़ें.


डिजिटल सुरक्षा: सामग्री की सुरक्षा और भंडारण :

चुनाव के समय काम से सबंधित सामग्री के भंडारण और सुरक्षा के बारे में अच्छे प्रोटोकॉल होना महत्वपूर्ण है। यदि किसी पत्रकार को हिरासत में लिया जाता है, तो उनके उपकरणों को जब्त किया जा सकता है और उसमें संकलित दस्तावेजों इत्यादि को खोजा जा सकता है, जिसके परिणाम  पत्रकार और उनके सूत्रों के लिए गंभीर हो सकते हैं। चुनाव में समाचार संकलन करते समय उपकरणों को तोड़ा या चोरी भी किया जा सकता है, ऐसे में डाटा बैकअप न होने पर पत्रकार द्वारा इकट्ठा की गई महत्वपूर्ण जानकारी खो सकती है.

इन बिंदुओं को ध्यान में रख कर आप खुद को और संकलित सूचनाओं को  सुरक्षित रख सकते हैं :  


डिजिटल सुरक्षा: सकुशल संचार के तरीके

सुरक्षित तरीके से संवाद आपकी डिजिटल सुरक्षा का एक अहम् हिस्सा है. ऐसे समय में यह और ज़रूरी हो जाता है  क्योंकि ज़्यादातर पत्रकार कोविड-19 के चलते किसी एक जगह से काम नहीं कर रहे हैं. पत्रकार और सम्पादक मिलने के बजाए, वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग का ज़्यादा से ज़्यादा प्रयोग कर रहे हैं. ऐसे में यह सुनिश्चित करना कि इन मीटिंग्स को कोई और आसानी से देख न पाए, कर्मचारियों और सूत्रों की सुरक्षा के लिए ज़रूरी हो जाता है.

ज़ूम का प्रयोग करते समय:

ज़ूम का प्रयोग करते समय, स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए इन बातों का ध्यान रखें:

अधिक जानकारी के लिए, घर से काम करने वाले पत्रकारों के लिए सीपीजे  की डिजिटल सुरक्षा सलाह देखें।


शारीरिक सुरक्षा: कोविड-19 के सन्दर्भ में

चुनाव के दौरान या सम्बंधित विरोध प्रदर्शन के दौरान शारीरिक दूरी बनाए रखना चुनौतीपूर्ण कार्य होता है. आम तौर पर इलाके भीड़-भरे होते हैं, जहाँ संभवतः ही आम लोग अपने चेहरे को नहीं ढक रहे  होते हैं या फेस मास्क नहीं लगाए हुए होते हैं. ऐसे में संभव है कि मीडियाकर्मी दूसरे पत्रकारों से बहुत कम दूरी पर काम कर रहे हों.  कम दूरी के कारण मीडियाकर्मी वायरस का शिकार हो सकते हैं, इसके अलावा कुछ हमलावर जबरन बोल कर या खांस कर आपके ऊपर शारीरिक हमला कर सकते हैं.

ध्यान दें रैली में चिल्लाते और नारे लगाते हुए लोग वायरस की बूदें फैला सकते हैं, जिससे मीडिया कर्मियों में कोरोना वायरस संक्रमण का खतरा बढ़ सकता है.

कोविड-19 रिपोर्टिंग दिशानिर्देशों के लिए   सीपीजे सुरक्षा सलाह को यहाँ देखें


दिल्ली-उत्तर प्रदेश सीमा के पास गाजीपुर में एक विरोध स्थल को खाली करते हुए  किसानों के बीच भारत के सबसे बड़े किसान संघों में से एक, भारतीय किसान संघ के नेता राकेश टिकैत  15 दिसंबर, 2021 को भारतीय राष्ट्रीय ध्वज हाथ में लिए हुए। (रॉयटर्स/ अनुश्री फडणवीस)

शारीरिक सुरक्षा: चुनाव रैलियों और प्रदर्शनों से रिपोर्टिंग

चुनाव के दौरान मीडिया कर्मियों को अक्सर भीड़-भाड़ वाली रैलियों, प्रचार अभियान, लाइव ब्रॉडकास्ट और प्रदर्शनों से काम करना होता है.

ऐसी जगहों से काम करने समय स्वयं की सुरक्षा हेतु मीडियाकर्मी इस बातों का ध्यान रखें:

राजनीतिक आयोजन एवं रैलियां

विरोध प्रदर्शन :

 योजना:

जागरूकता एवं स्थिति निर्धारण:

पुलिस द्वारा आँसू गैस इस्तेमाल किये जाने की स्थिति में :

आँसू गैस के इस्तेमाल से खांसी, छींक, थूक निकलना, आँसू निकलना और बलगम से साँस लेने में तकलीफ़ होती है. कई बार इसके संपर्क में से उलटी आना और साँस लेने में मुश्किल होने जैसी समस्या भी हो सकती है. यह लक्षण हवा में मौजूद कोविड-19 वायरस की बूदों से एक मीडिया कर्मचारी को होने वाले खतरे को कई गुना बढ़ा देते हैं. ऐसे लोग जिन्हें सांस से जुड़ी बीमारी जैसे कि दमा की शिकायत हो या फिर वह कोविड-19 संक्रमण के ज़्यादा जोखिम वाली श्रेणी में आते हों, उन्हें ऐसी जगह जहाँ ऑंसू गैस चलने का खतरा हो, वहाँ जाने से बचना चाहिए.

NPR (एनपीआर ) द्वारा दी गयी जानकारी के अनुसार, ऑंसू गैस कोरोना वायरस जैसे रोगजनक़ों से होने वाले संक्रमण की संभावना को कई गुना बढ़ा देती है.

आँसू गैस के असर और उपचार से जुड़ी और अधिक जानकारी के लिए सीपीजे की सिविल डिसऑर्डर एडवाइजरी पढ़ें.

शारीरिक हमला:

प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्रकारों पर हमले की घटनाएं भारत में पहले हो चुकी हैं एवं अक्टूबर 2021 में, स्थानीय किसानों के विरोध प्रदर्शन जो हिंसक हो गया था, वहाँ समाचार संकलन करते समय लगी चोटों से  स्वतंत्र पत्रकार  रमन कश्यप की मौत का सीपीजे ने दस्तावेजीकरण किया।

जब भी आप ऐसी परिस्थिति में हों जहाँ आप पर शारीरिक हमला हो सकता हो तो इन बातों का ध्यान रखें:


10 जनवरी, 2022 को  राज्य विधानसभा चुनाव से ठीक पहले,भारत के अमृतसर में एक बाजार क्षेत्र में गश्त लगाते हुए अर्धसैनिक बल के जवान और पंजाब पुलिस के जवान। (एएफपी/ नरिन्दर नानू)

शारीरिक सुरक्षा: आक्रामक समुदाय के बीच से रिपोर्टिंग

पत्रकारों को कई बार ऐसे इलाकों और समुदाय के बीच से रिपोर्टिंग करने होती है जोकि बाहर से आने वालों और मीडिया के प्रति आक्रामक होते हैं. ऐसा तब हो सकता है जब उस समुदाय को ऐसा लगे कि मीडिया उनके पक्ष को सामने नहीं रख रही है या फिर उनपर रिपोर्टिंग अनुचित तरीके से कर रही है. चुनाव के समय पत्रकारों को लम्बे समय तक मीडिया के प्रति आक्रामक समुदाय के बीच काम करना पड़ सकता है.

खतरे को कम करने हेतु:

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